1. Negative and Positive is necessary But +ve is Must & First
प्राथमिक-रूप से अंतिम तक,
केवल पॉजीटिव सोच की आवश्यकता है....
पोजिटिव-निगेटिव, हर बार ये शब्द सामने आते हैं ये केवल सोच के नहीं, संस्कार के है ,वातावरण के है, संसार मैं नकारात्मक और सकारात्मक दो ही बातें है जो हर जगह, हर चीज पर लागू होती हैं । मैं आपसे कोई वस्तु मांगता हूँ तो दो बाते होंगी- आप देंगे या नहीं देंगे, यही पोजिटिव या नेगेटिव बात है परन्तु यहाँ एक सोच और काम करती है कि, जैसे मैं एक वस्तु को आप से मांगूगा तो आप मना नहीं करेंगे ,यह है मेरा विश्वास है और यदि आप मना भी करेंगे तो आपको बुरा लगेगा क्यूंकि आपको मालूम है की मैंने भरपूर आत्म-विश्वास से माँगा था यही पोजीटेव एनर्जी यानि धनात्मक उर्जा है, यही हमें इश्वर के सामने मांगने पर भी प्रतीत होती है यानि विश्वास पक्का होने से धनात्मक उर्जा पैदा होती है ।
यदि आप अपने काम मैं विश्वास नहीं रख पा रहे है तो आप केवल प्रयोग ही कर रहे है जो शायद कभी-कभी सफल भी हो जाय मगर यह अधूरी सफलता है । आप जो भी काम करें पूरे विश्वास से धनात्मक उर्जा के साथ करें और विश्वास रखें सफलता,दौलत ,शोहरत जो भी आप चाहते है ,आपके कदमो मैं होंगी यही बात राम चरित मानस मैं भी कही है ...
जेहि कर, जेहि पर सत्य सनेहू ,सो तेहि मिळत न कछु संदेहू ।
और यही बात ओउम शांति ओउम फिल्म मैं कही है कि
जब आप किसी को दिल से चाहते हैं तो सारी कायनात ..........

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